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श्रीराधे

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*कोई श्याम सुन्दर से कहदो यह जाके।* *भुला क्यों दिया हमें, अपना बना के॥* *अभी मैंने तुमको निहारा नहीं है,।* *तुम्हारे सिवा कोई हमारा नहीं है॥* *चले क्यों गए श्याम दीवाना बना के।* *भुला क्यों दिया हमें, अपना बना के ॥* *अभी मेरी आखों मे आसूँ भरे है,।* *जखम मेरे दिल के अभी भी हरे हैं॥* *चले क्यों गए श्याम बंसी बजा के,।* *भुला क्यों दिया हमें, अपना बना के ॥* *अगर तुम ना आये तो दिल क्या करेगा ,।* *तुम्हारे लिए ही तड़पता रहेगा॥* *निभाना नहीं था तो पहले तो ही कहते।* *बुझाते हो क्यों आग दिल मे लगा के ॥*  *जय राधेश्याम जी*

श्री सर्वेश्वर प्रभु

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श्रीसर्वेश्वर प्रभु दर्शन । निम्बार्क सम्प्रदाय के आराध्य भगवान श्री सर्वेश्वर प्रभु है l आचार्य परम्परा व श्री निम्बार्क सम्प्रदाय के उपासक युगल श्री राधामाधव सर्वेश्वर भगवान है l श्री युगल नाम की उपासना हमें सुदर्शन चक्रावतर भगवान श्री निम्बार्क से प्राप्त हुई है । आप श्री भगवान देवऋशी नारद जी से दीक्षित हुये (जो सम्प्रदाय के तीसरे आचार्य है ) जब जब पृथ्वी पर पाप का अंधकार बडा स्वयं भगवान ने इस धराधाम में प्रकट होकर अपने भक्तों की रक्षा की है ओर धरती पर धर्म की पुनः स्थापना की व पाप रूपी अंधकार का समापन किया है l भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र को धरती पर अवतरित होने का आदेश दिया । भगवान श्री निम्बार्क ने हमें युगल नाम की महिमा को बताया है l युगल नाम की यह रसमय उपासना हमें प्रदान करने वाले अध्याचार्या हमारे श्री निम्बार्क भगवान है । भगवान का यह युगलमहामंत्र हमें आप श्री से ही प्राप्त हुआ है । आपकी सम्प्रदाय के प्रथम आचार्य तो भगवान के 24 अवतारों में भगवान हंस से प्रारंभ होती है आपके शिष्य रूप में भगवान संकादिक ऋषि (भगवान सर्वेश्वर आपके द्वारा ही संसेवित है जो आज भी निम्...

Radhe radhe

Radhe radhe

SHRI NIMBARKA SAMPRADAYA

SHRI NIMBARKA SAMPRADAYA is one of the most ancient of the VAISHNAVA SAMPRADAYS and is based on the DWAITADWAIT philosophy first PROPOUNDED BY HANS BHAGWAN to SHRI SANKADI BHAGWAN then TO SHRI NARADA MUNI and then on to SHRI SUDARSHANA, CHAKRAVATAR, JAGAT GURU SHRI NIMBARKACHARYA. The basic tenet consists of the worship of SHRI RADHA MADHAV with  SHRI RADHE being personified as the inseparable part of SHRI KRISHNA. The unbroken line of the SAMPRADAYA beginning from BHAGWAN SHRI NIMBARKACHARYA has now continued for more than five thousand years tilldate. Presently the head of the SAMPRADAYA is his holiness  Jagadguru Nimbarkacharya Shri Shriji Maharaj Brindavan, Nandgram, Barsana and Govardhan   are the chief Kshetras or holy lands of the followers of Nimbarkacharya.  Parikrama of the 168 miles of Brij Bhumi is their foremost duty. 16 WORD MAHA MANTRA Radhe Krishna Radhe Krishna, Krishna Krishna Radhe Radhe| Radhe Shyam Ra...

AKHIL BHARATIYA NIMBARKACHARYA PEETH

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      AKHIL BHARATIYA NIMBARKACHARYA PEETH 16 WORD MAHA MANTRA     RADHE KRISHNA RADHE KRISHNA  KRISHNA KRISHNA RADHE RADHE           RADHE SHYAM RADHE SHYAM SYAM SHYAM RADHE RADHE   SRI NIMBARKA SAMPRADAYA IS ONE OF THE MOST ANCIENT OF THE VAISHNAVA SAMPRADAYS; AND IS BASED ON THE DWAITADWAIT PHILOSOPHY FIRST PROPOUNDED BY HANS BHAGWAN TO SRI SANKADI BHAGWAN THEN TO SRI NARADA MUNI AND THEN ON TO SRI SUDARSHANA; CHAKRAVATAR; JAGAT GURU SRI NIMBARKACHARYA. THE BASIC TENET CONSISTS OF THE WORSHIP OF SRI RADHA MADHAV , WITH SRI RADHE BEING PERSONIFIED AS THE INSEPERABLE PART OF SRI KRISHNA. THE UNBROKEN LINE OF THE SAMPRADAYA BEGINNING FROM BHAGWAN SHRI  NIMBARKACHARYA HAS NOW CONTINUED FOR MORE THAN FIVE THOUSAND YEARS; AND EXTOLS THE FOURTH SAMPRADAYA OF VAISHNAVISM WHICH PROPOUNDS THE DVAITA-ADVAIT; i.e THE BHEDABHED SCHOOL OF PHILOSOPHY . AS PER SRIMAD BHAGAVATHAM TRUE KNOWLEDGE WAS CO...

द्वैताद्वैत वेदान्त

द्वैताद्वैत वेदान्त निंबार्क  (11 वीं शताब्दी) का दर्शन रामानुज से अत्यधिक प्रभावित है। जीव ज्ञान स्वरूप तथा ज्ञान का आधार है। जीव और ज्ञान में धर्मी-धर्म-भाव-संबध अथवा भेदाभेद संबंध माना गया है। यही ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता है। ईश्वर जीव का नियंता, भर्ता और साक्षी है। भक्ति से ज्ञान का उदय होने पर संसार के दु:ख से मुक्त जीव ईश्वर का सामीप्य प्राप्त करता है। अप्राकृत भूत से ईश्वर का शरीर तथा प्राकृत भूत से जगत्‌ का निर्माण हुआ है। काल तीसरा भूत माना गया है। ईश्वर को कृष्ण राधा के रूप में माना गया है। जीव और भूत इसी के अंग हैं। यही उपादान और निमित कारण है। जीव-जगत्‌ तथा ईश्वर में भेद भी है अभेद भी है। यदि जीव-जगत्‌ तथा ईश्वर एक होते तो ईश्वर को भी जीव की तरह कष्ट भोगना पड़ता। यदि भिन्न होते तो ईश्वर सर्वव्यापी सर्वांतरात्मा कैसे कहलाता?

निम्बार्काचार्य

निम्बार्काचार्य निम्बार्काचार्य   भारत  के प्रसिद्ध दार्शनिक थे जिन्होने  द्वैताद्वैत  का दर्शन प्रतिपादित किया। उनका समय १३वीं शताब्दी माना जाता है। किन्तु निम्बार्क सम्प्रदाय का मानना है कि निम्बार्क का प्रादुर्भाव ३०९६ ईसापूर्व (आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व) हुआ था। निम्बार्क का जन्मसथान वर्तमान  आंध्र प्रदेश  में है। परिचय सनातन संस्कृति की आत्मा  श्रीकृष्ण  को उपास्य के रूप में स्थापित करने वाले निंबार्काचार्य वैष्णवाचार्यों में प्राचीनतम माने जाते हैं। राधा-कृष्ण की युगलोपासना को प्रतिष्ठापित करने वाले निंबार्काचार्य का प्रादुर्भाव  कार्तिक   पूर्णिमा  को हुआ था। भक्तों की मान्यतानुसार आचार्य निंबार्क का आविर्भाव-काल द्वापरांत में कृष्ण के प्रपौत्र  बज्रनाभ  और परीक्षित पुत्र  जनमेजय  के समकालीन बताया जाता है। इनके पिता अरुण ऋषि की, श्रीमद्‌भागवत में परीक्षित की भागवतकथा श्रवण के प्रसंग सहित अनेक स्थानों पर उपस्थिति को विशेष रूप से बतलाया गया है। हालांकि आधुनिक शोधकर्ता निंबार्क के काल को वि...